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बाबा साहेब भीमराव अंबेडकर के व्यक्तित्व और कृतित्व के अनेक पहलुओं पर प्रकाश डाला जा चुका है लेकिन उनके महिला सुधार पर लेखकों व लेखिकाओं ने कम प्रकाश डाला है।अम्बेडकरवादी विचारधारा के लेखक नारियों के प्रति उनके द्रष्टिकोण को स्पष्ट करते रहे हैं और दलित नारीवादी लेखकों ने भी अम्बेडकर को अपना आदर्श माना है। किन्तु नारीवादियों की एक बड़ी जमात ने अंबेडकर के नाम व काम से अपनी नज़रें फेर लीं हैं।

उन्नीसवीं शताब्दी के दूसरे अर्धांश में भारत मे राष्ट्रवादी विचारों का उदय होना आरम्भ होता है, राष्ट्रवाद के इन विविध रूपों को इतिहासकारों ने अनेक नाम दिए हैं यथा आर्थिक राष्ट्रवाद, सामाजिक राष्ट्रवाद व धार्मिक राष्ट्रवाद आदि। आरम्भिक राष्ट्रवाद के इन रूपों में समाज सुधार का भी एक तत्व प्रतीत होता है। सर सैयद अहमद खान ने मुस्लिम समुदाय को आधुनिक व अंग्रेजी शिक्षा प्राप्त करने का आह्वाहन किया किन्तु सर सैयद अहमद खान मुस्लिम महिलाओं के लिए पुरुषों के नियंत्रण में प्राथमिक शिक्षा को ही पर्याप्त माना जिसका उद्देश्य एक अच्छी घरेलू महिला बनान होता था (खुतबाद-ए-सर सैयद, ज़िल्द-दोम, पृष्ठ 279-280)। कांग्रेस में अपनी स्थापना (1885) के बाद समाज सुधार को अपनी राजनीति का अंग बनाया था जिसमें नारी को कुप्रथाओं से मुक्ति व आधुनिक शिक्षा देना शामिल था किंतु कांग्रेस का यह जोश ज्यादा समय तक नहीं चला और 1893 के कांग्रेस के राष्ट्रीय अधिवेशन में एक तरह से ये स्वीकार कर लिया गया कि समाज सुधार कांग्रेस की राजनीति का अंग नही हो सकता है।  समाज सुधार के लिए अलग से संस्था का गठन किया गया व कांग्रेस ने अपना मुख्य काम राजनीति स्वीकार किया।

इन्ही सब घटनाक्रमों के बीच मे महाराष्ट्र की फुले दंपति ने फ़ातिमा शेख़ की मदद से देश का पहला महिला विद्यालय खोला जिसके दरवाज़े सर्व समाज की महिलाओं के लिए खुले थे। जिनमें पड़ने वाली छात्राएं व शिक्षक सर्व समाज के थे। भारत में देशज लोगों द्वारा अपनी तरह का पहला प्रयोग था जिसमें समाज सुधार की भावना निहित थी। आगे चलकर फुले दंपति ने विधवा महिलाओं के लिए आश्रम खोला था। उन्नीसवीं शताब्दी के ये प्रयास अपनी जड़ जमाते रहे है। उन्नीसवीं शताब्दी के अंत व बीसवीं शताब्दी के प्रारंम्भ में भिन्न भिन्न सभाओं व आश्रमों के माध्यम से स्त्री सुधारों पर काम चलता रहा था किन्तु इन सुधारों के केंद्र बिन्दु विधवा, अपने पतियों की छोड़ी हुई महिलाएं थी साथ ही वो महिलाएं भी जिनका विवाह बचपन में हो जाता था और वो कम उम्र में ही विधवा हो जाती थीं। इन आश्रमों का प्रयास उक्त पीड़ित महिलाओं को शिक्षा देना होता था ताकि वो अपने पैरों पर खड़ी हो सकें। इसी बीच 1916 में प्रथम महिला विश्विद्यालय की स्थापना मुम्बई में होती है। किन्तु महिलाओं के लिए बराबरी व सम्पत्ति में अधिकार अभी भी मृगरीचिका थी। इस समाज सुधारों की एक प्रकति थी कि ये कुलीन और सीमित दायरे में थे, विस्तृत समाज की महिलाओं के लिए अभी कोई कार्यक्रम नहीं था।

इसी बीच महिलाओं के विवाह की उम्र की सीमा बड़ाने को लेकर  बाल विवाह निषेध एक्ट, 1929 आता है जिसमे स्त्री के लिए विवाह की उम्र 14 व पुरुष के लिए 18  तय की गई, इसी सीमा को आज़ाद भारत मे बढ़ाकर क्रमशः 18 व 21 किया गया था। इसके बाद स्त्री अधिकारों की लड़ाई में एक ठहराव देखने मे आता है यह सम्भवता इसलिए भी था क्योकी इसके बाद साम्प्रदायिक राजनीति व विदेशी ताकतों से देश को मुक्त कराने की लड़ाई और मुखर हो गई थी। यह तो तथ्य है कि संप्रदायिक राजनीति का शिकार महिलाएं होती है व इसकी पीड़ा सबसे ज्यादा महिलाओं को ही झेलना पड़ा है। जबकि साप्रदायिक राजनीति का ज़िम्मेदार महिलाओं को नही माना जा सकता है।

बीसवीं शताब्दी के अर्धांश तक महिला अधिकारों की लड़ाई भारत के मुख्यधारा में नही रही बल्कि यह लोगों के व्यकितगत प्रयासों से लड़ी जाती रही थी। इसका कारण महिलाओं की समरूप पहचान का न होना भी है। उपर्युक्त समाज सुधार सिर्फ़ समाज के उच्च तबक़े की महिलाओं तक ही सीमित रहे, इन सुधारों ने अछूत व आदिवासी समाज की महिलाओं की स्थिति को ज्यादा प्रभावित नहीं किया।

डॉक्टर भीमराव अम्बेडकर की भारतीय समाज में सक्रियता सन 1920 के आस पास शुरू होती जो समाज के साथ बड़ती जाती है जो भारतीय राजनीति का लोकतांत्रिकरण कर रही है। बाबा साहेब भीमराव अंबेडकर ने समाज सुधार का आरम्भ अछूत समस्या के साथ किया व हज़ारों सालों की शोषित पीड़ित जनता के एक मात्र मुखर आवाज़ के रूप में स्थापित हुए। बाबा साहेब भीमराव अंबेडकर ने अपने आंदोलन में स्त्रियों को बराबरी का स्थान दिया। बाबा साहेब अंबेडकर को जब भारत का संविधान लिखने का अवसर मिला तो उन्होंने हर नागरिक को लिंग, जाति, नस्ल व क्षेत्र का भेदभाव किये बिना कानून के समझ समता का अधिकार दिया।

बाबा साहेब व हिन्दू कोड बिल का विश्लेषण समझने योग्य है बाबा साहेब संविधान के निर्माण के समय ही हिन्दू कोड बिल को संविधान में शामिल करना चाहते थे, लेकिन तब संविधान सभा के सदस्य इसके लिए तैयार नही थे। संविधान सभा के सदस्यों ने प्रारूप समिति के सदस्यों को हिन्दू कोड बिल ठंडे बस्ते डालने का सुझाव दिया और प्रारूप समिति ने उसको मान लिया। संविधान के अंगीकार हो जाने के बाद इस बिल को सही समय लोकसभा में लाने का वचन दिया गया। इस बीच देश मे संविधान लागू हुआ जवाहरलाल नेहरू प्रथम प्रधानमंत्री बने व बाबा साहेब भीमराव अंबेडकर ने पहले क़ानून मंत्री पदभार संभाला। सितंबर 1951 में लोकसभा में हिन्दू कोड बिल चर्चा के लिए लाया गया। हिन्दू कोड बिल के मुख्य भाग हिन्दू पुरुषों पर एक से ज्यादा विवाह पर प्रतिबंध, महिलाओं को तलाक़ लेने का अधिकार, व पिता की संपत्ति में बेटी को बेटे के बराबर का अधिकार देना आदि शामिल था। हिंदू कोड बिल के लोकसभा में आते ही सदन के अंदर व बाहर पुनरुद्धनवादी ताकतों व रूढ़िवादी हिन्दू नेताओ ने हंगामा खड़ा कर दिया। सदन के अंदर हंगामा हुआ और बाहर लोगों ने बाबा साहेब भीमराव अम्बेडकर के विरुद्ध धरने दिए गए, महिलाओं ने बाबा साहेब अम्बेडकर के विरुद्ध ‘विरोध रैली’ निकली। हिन्दू धार्मिक नेताओं ने अंबेडकर पर हिन्दू समाज को तोड़ने व हिन्दू धार्मिक ग्रंथों के ज्ञान न होने का आरोप लगाया। अम्बेडकर ने सभी को एक एक करके उत्तर देना शरू किया व यह सिद्ध कर दिया कि हिन्दू कोड बिल हिन्दू रीति रिवाजों के अनुरूप ही है इसलिए इसका विरोध नही होना चाहिए। लेकिन रूढ़िवादी ताकते शांत होने का नाम नहीं ले रही थी। देश में बढ़ते विरोध और प्रस्तावित लोकसभा चुनावों को देखकर प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने हिन्दू कोड बिल वापस ले लिया। बाबा साहेब भीमराव अंबेडकर इससे नाराज़ हो गये और उन्होंने क़ानून मंत्री के पद से इस्तीफ़ा दे दिया।

हिन्दू कोड बिल के लिए जितनी लड़ाई बाबा साहेब ने लड़ी, उतनी शायद ही किसी नेता ने ली होगी। बाबा साहेब ने हिन्दू कोड बिल विरोध झेला, धार्मिक पुरातनपंथीयों से लड़ाई लड़ी यहाँ तक कि कानून मंत्री की कुर्सी भी छोड़ दी क्योकि वे जानते थे कि देश सही मायनों में तभी आज़ाद हो सकता है जब देश की महिलाएं को बराबरी का हक़ मिलेगा। देश के धार्मिक पुरातनपंथी लोगो ने महिलाओं को समाज में बराबरी का हक़ देने वाले कानून हिन्दू कोड बिल को लेकर इतना दुष्प्रचार किया कि बाद में नेहरू सरकार इसको एक साथ पास न कर सकी और ये कानून आज टुकड़ों में हिन्दू मैरिज एक्ट, हिन्दू उत्तराधिकार कानून आदि रूपों में हमारे समक्ष उपस्थित है।

यह विश्लेषण करने योग्य है कि भारतीय नारीवादी लेखकों ने अम्बेडकर को किस तरह से अपनाया है। जब इस ओर नज़र डालते हैं तो हमें निराशा हाथ लगती है। नारीवादी लेखक अभी भी अम्बेडकर को जाति की समस्या तक ही सीमित रखते हैं, वो नारी उद्धार के प्रश्न पर अम्बेडकर को वह स्थान देने के लिए तैयार नही है जिसके अम्बेडकर हक़दार हैं। बाबा साहेब अंबेडकर ने तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू के महिला आयोग बनाने के वादे के पूरे न होने पर कानून मंत्री के पद से इस्तीफ़ा दे दिया था। बाबा साहेब अम्बेडकर की नज़र हर उस इंसान पर थी जिसका शोषण हुआ था। इसी कारण उन्होंने महिला मुद्दों को गंभीरता से उठाया था। बाबा साहेब अंबेडकर कहते थे, “मैं किसी समाज की तरक्की इससे मापता हूं कि इस समाज मे महिलाओं की क्या स्थिति है कांग्रेस” अर्थात बाबा साहेब अम्बेडकर महिलाओं की तरक़्क़ी से ही समाज की तरक़्क़ी देखते हैं। बाबा साहेब का नारीवाद महिलाओं को घरेलू बनाने में व उन्हें सीमित दायरे में आज़ादी देने वाला नहीं है उनका नारीवाद महिलाओं को वो सभी अधिकार देने में है जो एक मानव के हो सकते हैं। बाबा साहेब को नारीवादीयों द्वारा स्थान न दिए जाने का एक कारण भारतीय नारीवादी लेखकों की वर्गीय व जातीय संरचना भी हो सकता है जो अपनी प्रकति में बहुत कुलीन है, जिसका लोकतांत्रिकरण होने की आवश्यकता है।

अनुराग गौतम शोधार्थी (इतिहास विभाग) दिल्ली विश्वविद्यालय

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