एक भावी कड़ियल अफसर की कथा

निसार अहमद

जैसे तैसे करके आज BPSC (बाहुबली पब्लिक सर्विस कमीशन) की प्री परीक्षा संपन्न हो गई, यह दुनिया की इकलौती ऐसी कमीशन है जिसके पास ऑप्शन के भंडार होते हैं, यानी एक प्रश्न के 5 5 6 6 और कभी कभी तो सात सात ऑप्शंस होते हैं, अच्छा खासा पढ़ा लिखा आदमी भी उन ऑप्शन में गड़बड़ा कर फस जाता है, हम जैसे बुद्धिमान छात्र तो वैसे ही A B C D नामक चार ऑप्शन के बीच घूर मुड़िया खाते रहते हैं उन्हीं चारों में उलट-पुलट करते रहते हैं कई दफा तो हमें उंगलियों को दांतो के नीचे दबाकर ऑप्शन का पता लगाना होता है , यह हमारे परीक्षा का डकवर्थ लुईस सिस्टम है जो कभी भी गड़बड़ा सकता है,दांतो का जोर जिस उंगली पर ज्यादा हो ऑप्शन भी वही होगा ऐसा हमारा मानना है ,इस अविष्कार का श्रय भी हम बिहारी छात्रों को ही जाता है, D ऑप्शन तक तो ठीक था पर बीपीएससी ने जब से E का ऑप्शन दिया है तब से अंगूठा लगाकर पांचों उंगलियों को दांत से दबाना पड़ता है अंगूठे की उंगली मोटी होने की वजह से हर बार दांतो का भार उसी पर ज्यादा पड़ता है और हमें मजबूरन E ऑप्शन पर गोला दागना पड़ता है रिजल्ट हर बार की तरह सेम होता है यानी ज़ीरो बटे सन्नाटा , अफसोस की एक कड़क और रूबियल अफसर बनने का सपना चकनाचूर हो जाता है हम फिर से बंद कमरे में इम्तियाज अहमद को रटने लग जाते हैं! अबकी बार बीपीएससी पार, पापा विडियो, बीपीएससी का खजाना, BPSC times, लुसेंट, योजना, बीपीएससी समाधान और ना जाने कितनी ऐसी पत्रिकाएं पढ़ते हैं, लेकिन लमहे भर में हमारा सारा ज्ञान धड़ाम से ज़मीन में सजदा रेज़ हो जाता है!

हे आयोग, हमारे दुख दर्द को समझिए, टिकटके अभाव में दिल्ली से पटना पहुंचना कितना मुश्किल है वो हम से पूछिए, अलीगढ़ के पास हम ने किसी तरह टीटी को छका दिया, इलाहाबाद के पास तो लैट्रिन में घुसकर जान बचानी पड़ी, लखनऊ में टीटी से धरते-धराते बचा, किसी तरह से लटकते लटकाते चना समोसा खाते हुए पटना पहुंचा, बस में इतनी मारामारी थी के ऊपर छत पर बैठकर सफर करना पड़ा, बड़ी मुश्किल से सेंटर तक पहुंचा था
हे बाहुबली पब्लिक सर्विस कमीशन जब आप E में किसी प्रश्न का उत्तर ही नहीं देते तो आप हमें उल्लू क्यों बनाते हैं , हम कोई चाणक्य और आर्यभट्ट तो है नहीं के दूर की कौड़ी ले आएंगे, हम चमचमाते शहरों में मोबाइल लैपटॉप और इंटरनेट पर जिंदगी बसर करने वाले प्राणी हैं, हम पर दया कीजिए महाशय! आर्यभट्ट और चाणक्य के जमाने लद गए अगर आप तक मेरी बात पहुंच जाए तो मुझे दुखिया की बात पर ध्यान केंद्रित कीजिएगा !
लेकिन हम भी सख्त मिट्टी से बने हैं हम बिहारी हैं हार मानना तो हमारी कुंडली में है ही नहीं, हम जब तक तोड़ते नहीं तब तक छोड़ते नहीं, अगली बार हम फिर आएंगे परीक्षा हाल में दही चूड़ा खा कर जाएंगे कसम एनआईटी घाट की कसम सब्जीबाग की तंग गलियों की ,हम बिस्कोमान टावर पर कामयाबी के झंडे गाड़ेंगे, पूरा बिहार हम पर नाज करेगा!
हे बाहुबली पब्लिक सर्विस कमीशन E ऑप्शन पर गौर करके हम पर दया करना.
आपका एक प्रतिभाशाली, विद्वान मगर दुखी विद्यार्थी

निसार अहमद जवाहरलाल नेहरु यूनिवर्सिटी दिल्ली में रिसर्च स्कॉलर हैं.

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