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अनुराग गौतम

हिन्दी फिल्मो का आरंभ दादा साहेब फ़ाल्के द्वारा निर्मित ‘राजा हरिश्चन्द्र’ (1911) फ़िल्म से माना जाता है शुरुआती फ़िल्मे बिना आवाज़ के,ब्लैक एंड व्हाइट चलचित्र मात्र होते थे समय के साथ-साथ फिल्मों में आवाज़ सबसे पहले आलम आरा (1931)  और रंग किसान कन्या (1937) के साथ आये। रंगीन फ़िल्मे बनाना आरम्भ में महँगा काम होता था इसलिए फिल्म निर्माता श्वेत श्याम फ़िल्मे ही बनाते रहे। 60 के दशक तक रंगीन फ़िल्मे बनाना फ़िल्म निर्माताओं के सपना होता था यहाँ तक कि अपने दौर की सबसे महंगी फ़िल्म मुग़ल-ए-आजम(1960) भी आरंभ में ब्लैक एंड व्हाइट ही बनाई गई थी, जिसे बाद में निर्देश कमालुद्दीन आरिफ के पुत्र में रंगीन रूप में 2004 में उतारा।

हिंदी फिल्म उद्योग ने विभिन्न विषयों पर फ़िल्मे बनाई है पर फिल्मों का मुख्य विषय प्रेम रहा है। फिल्मों का विषय प्रेम होने के कारण गीत संगीत का महत्व रहा है। मध्यकालीन भारत की भक्ति व सूफी  के आंदोलन जिनके केंद्र में मानव का ईश्वर के प्रति प्रेम था, भक्ति व सूफ़ी परम्परा, प्रतीकों को फिल्मों ने अपनाया है। संगीतकारों व फिल्म निर्माताओं ने सूफ़ी संगीत फ़िल्म: रॉकस्टार (2011) में गीत:-‘क़ुन फाया क़ुन’ के रूप में अपनाया है व इस गीत का चित्रण सूफी संत शेख निज़ामुद्दीन औलिया (1238-1325)  की दिल्ली स्थित दरगाह में किया है। इसी प्रकार फ़िल्म: मैं तुलसी तेरे आंगन की (1978), के गीत ‘छाप तिलक सब छीनी’ को अभिनेता व अभिनेत्री के बीच गहन प्रेम क्रिया के रूप में चित्रित किया है जिसमे अभिनेत्री अभिनेता को अपनी मादक अदाओ से आकर्षित करती नजर आती है।

मीरा के नाम व चरित्र को फिल्मों में अच्छी तरह से अपनाया है मीरा के नाम को फ़िल्म: राम तेरी गंगा मैली (1985)  में गीत ‘एक राधा एक मीरा’ में ‘राधा-कृष्ण’ व ‘मीरा-कृष्ण’ के बीच के प्रेम की तुलना को गीत के माध्यम से उभारा है, उक्त गीत को अभिनेत्री मन्दाकिनी व अभिनेता राजीव कपूर के बीच संदेश देने के रूप में फ़िल्माया है। इसके साथ मीरा के चरित्र को फ़िल्म: डेंजरस इश्क़ (2012) में अभिनेत्री:- ग्रेसी सिंह ने निभाया है उक्त फ़िल्म में मीरा पर एक गीत “लगन लगी मोरे पिया, बस में नही मोरा जिया” को मीरा द्वारा कृष्ण की भक्ति के रूप में फिल्माया है। इसके अतिरिक्त सूफी संत, कवि व संगीतकार अमीर ख़ुसरो (1253-1325) के चरित्र को फ़िल्म: पद्मावत में अभिनेता:-मुज़म्मिल भवानी ने निभाया है।

शास्त्रीय प्रेम, रति क्रिया व भारतीय जनमानस

इसके अतिरिक्त अनेक हिंदी फिल्मों में सूफी व पीर बाबाओं की मज़ार व उससे जुड़े संगीत को फिल्मों में जगह मिली है। जैसे फ़िल्म बजरंगी भाईजान (2015) के गीत ‘भर दो झोला मेरी आज खाली’, व जोधा अकबर (2008) के गीत ‘ख़्वाजा मेरे ख़्वाजा’ आदि मुख्यधारा के सिनेमा में सूफी व सगुन भक्ति को अपनाया है। अब प्रश्न उठता है कि हिंदी फिल्म निर्माताओं ने इन संतो को अपनाने के बाबजूद भक्ति आन्दोलन के विशाल व्यक्तित्व रविदास और कबीर की वाणियों व चरित्र से क्यो नज़र फ़ेर ली है? जबकि इन सभी संतो की क्रोनोलॉजी व सामाजिक वैधता का स्तर एक ही है। सूफ़ी संतो की वाणिया अरबी व फ़ारसी में है जबकि गुरु रविदास व कबीर की वाणीयाँ उत्तर भारतीय हिंदी जनमानस के करीब ‘खड़ी बोली हिंदी’ में है जिनमे प्रेम, भक्ति व निष्ठा आदि तत्व उपस्थित है। इस अनदेखी के क्या कारण हो सकतें है ? क्या इसका कारण कबीर व रविदास का समाज के अछूत व शोषित तबक़ों से आना है ? या उनकी वाणियों में पाये जाने वाले भक्ति व प्रेम के अतिरिक्त जाति व्यवस्था पर उठाए गए सवाल है ? कबीर व रविदास के नाम से समाज मे ‘कबीर पंथ’ व ‘रविदास पंथ’ समाज मे फल फूल रहे है पर हिंदी फिल्मों में इनको कोई स्थान नही दिया गया है। हिंदी फिल्म निर्माताओं को इस पर गहन विचार करने की आवश्यकता है।

कबीर व रविदास के प्रति इसी प्रकार का रवैया भारतीय गीतकारों व ग़ज़ल गायकों का रहा है। हिंदी भाषा के गायकों व गीतकारों ने कबीर व रविदास पर शायद ही कोई गीत लिखा या गया हो। किन्तु कबीर व रविदास के प्रति यह रवैया गैर हिन्दू/ हिंदी गीतकारों का नही रहा है पंजाबी भाषा के ग़ैर-हिन्दू/ गैर-भारतीय क़व्वाल नुसरत फ़तेह अली खान ने रविदास पर गज़ल पंजाबी भाषा मे गायी है जिसके बोल ‘रविदास गुरु दा दुनिया मे इंज नाम देयंदा जांदा ऐ’ है, इसी प्रकार पंजाबी गायक नूरा सिस्टर्स ने रविदास पर गीत ‘रविदास गुरु इस गज अंदर आया बनके यार ग़रीबा दा’ गया है। इसके साथ ही पंजाबी युवा गायिका गिन्नी माही ने अपने गानों में रविदास को नए कलेवर में प्रस्तुत किया है। रविदास व कबीर आदि महापुरुषों की वाणियों को अपनाने के मामले में हिंदी सिनेमा अभी तक मौन है शायद हिंदी सिनेमा अपनी उस झिझक को नही तोड़ पा रहा है जिसको उर्दू व पंजाबी गायक बहुत पहले तोड़ चुके है। हिंदी सिनेमा को अपने चरित्र को ‘समावेशी’ बनाने की आवश्यकता है ताकि समाज मे उसकी मान्यता बनी रहे।

लेखक अनुराग गौतम दिल्ली विश्वविद्यालय के इतिहास विभाग में शोधार्थी हैं

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