देश मे ऐसा कोई भी राज्य नही है जहा दुष्कर्म, गैंगरेप या बलात्कार के मामले दर्ज नही होते प्रतिदिन सुबह जब न्यूज पेपर खोलते है तब न्यूज मे लिखा होता है ” 6 साल की मासूम से दुष्कर्म” 10 महीने के बच्ची के साथ हैवानियत, 19 साल की लडकी के साथ गैंगरेप, बाद में पीटकर हत्या। ये सब हमारे लेटलतीफे सिस्टम की वजह से होता है दुष्कर्म के आरोपी सामने होते है लेकिन सरकारें तमाशा देखती है विपक्ष हल्ला करती है लेकिन जिस मासूम के साथ रेप होता है उसके साथ न्याय नहीं होता, न्याय होने में इतना समय लगा दिया जाता है कि उसके बाद उस न्याय का कोई औचित्य नहीं बचता।

पिछले सालों कठुआ में मासूम के साथ रेप हुआ उसके आरोपियों के समर्थन कुछ सत्ताधारी दल के नेताओं ने तिरंगा रैली निकाली इस तरह से हमारे सभ्य समाज ने स्वतंत्र रुप से बलात्कार का समर्थन किया और बुद्धिजीवी वर्ग मूक बने देखते रहा यही वर्षो से होता आया है और अब भी हो रहा है।

बलात्कार जैसे मामलो को रोकने के लिये जितना जिम्मेदार सरकारी सिस्टम है उससे कई ज्यादा हम भी हैं हमने अपनी बहन बेटियों को मानसिक रुप से इतना कमजोर बना दिया है कि वो जिंदगी के फैसले भी खुलकर नहीं ले सकती आज जरुरत अपने घर के बेटों को ये सिखाने की है ”अगर कल को तुम्हारी बहन के साथ किसी ने रेप किया तो तुम पर क्या बीतेगी?” जब तक लड़के को अपनी बहन हर लड़की में नज़र नहीं आयेगी तब तक ऐसे ही महिलाओं पर उत्पीडन जारी रहेगा ये तो बलात्कार रोकने का भावनात्मक तरीका हुआ लेकिन कुछ कठोर निर्णय सरकारी सिस्टम को भी लेने होगे जब सरकारी सिस्टमी दुरुस्त नही होगा तब तक भले ही मोमबत्ती जलाइये या फिर तिरंगा रैलिया निकालेगी कुछ भी असर बलात्कारियों को नहीं पडे़गा।

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जब भारत को पुन: विश्नगुरु बनाने की बात होती है तब ऐसे दुष्कर्म के मामले पूरे विश्व मे देश को शर्मसार करते है जो भारतीयता पर कलंक होने के साथ साथ मानवीय मूल्यों पर धब्बा है रेप जैसी घटनाओं को रोकने के लिये समाज को भावनात्मक व शासकीय दोनो प्रणालियों से खुद मे बदलाव लाना होगा और ये बदलाव की शुरुआत अपने स्वयं करनी होगी तभी इसका जड से नाश होगा अन्यथा आज हाथरस तो कल बारां ये सिलसिला यूं ही चलता रहेगा।

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