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महक सिंह तरार

हुआ यह था कि किसानों के लिए, महात्मा गांधी के चंपारण आंदोलन के नतीजे में एक “रॉयल कमीशन ऑन एग्रीकल्चर” बना। इस कमीशन की रिपोर्ट की उर्वरा भूमि से, दीनबंधु सर छोटूराम ने 1939 मे किसान की फसलों को सही तरीके से बेचने के इंफ्रास्ट्रक्चर (अनाज मंडियों) की शुरुवात लाहौर असेंबली मे कानून बनवाकर की।
इसके नतीजे में मंडियों का ढांचागत विकास जिस तरह तत्कालीन पंजाब (पाकिस्तानी पंजाब, भारतीय पंजाब, हरियाणा व हिमाचल ) हुआ वैसा पूरे भारत मे कहीं नही हुआ। वर्तमान मे पंजाब मे कुल 153 APMC मंडियां है। हरयाणा मे 107 बड़ी ओर 174 छोटी मंडियां है। वही हिमाचल मे 59 छोटी/बड़ी मंडियां है।

बाकी 97 मंडी विभाजन मे पाकिस्तान चली गयी थी। इसके बाद देशभर की अधिकतर मंडियां या तो कार्यकारी नही है या सिर्फ सब्जी मंडी तक सीमित है। अब सब्जियों मे MSP लागू नही है।
जबकि पंजाब की मंडियां असली अनाज मंडियां है, जिनके दम पर वहां के किसानों को इंस्टिट्यूशनल खरीद (FCI जैसी) के चलते MSP मिल पाता है। मंडियां 6 से लेकर 8.5% तक टैक्स वसूल करती है जिससे बाकी मंडियों या ग्रामीण क्षेत्रों की सड़कों का निर्माण होता है।

अब नए कानूनों मे BJP सरकार ने मंडियों के बाहर किसी भी PAN कार्ड होल्डर को बिना टैक्स दिए अनाज खरीदने के अधिकार दे दिए है। मतलब आज FCI पहले की तरह मंडियों से अनाज खरीदे तो उसे वो महंगा पड़ेगा। ऐसे मे कोई बड़ा खरीदार महंगा खरीदने मंडी क्यों आयेगा? ओर इन कानूनों मे मंडी से बाहर खरीदने वाले पर भी MSP पर खरीदने की कानूनन पाबंदी नही है।
जब आप पूछते है, कि पंजाब के किसान आंदोलन क्यो करते है, तब यह भी पूछिये कि महाराष्ट्र या पंजाब मे किसान आत्महत्या क्यों करते है। किसान बाकी झारखंड, उड़ीसा या बिहार मे आत्महत्याएं कम है। इसके लिए आपको किसान कर्जे के अलावा ग्राउंड पर मनोविज्ञान का ज्ञान जरूरी है।

आत्महत्या के पीछे भूख या गरीबी से मरने का नही, स्वाभिमान छीने जाने, या इज्जत जाने का डर ज्यादा बड़ा कारक है। महाराष्ट्र और ग्रेटर पंजाब का किसान सामाजिक माहौल मे जमींदार रहा है। मतलब हमेशा देने वाली पोजीशन मे, ऊंचे दर्जे पर रहा है। पर जब आधुनिक सरकारों की नीतियां उसकी खेती को अनुत्पादक बनाती है तब सामाजिक स्तर से कमतर महसूस करना उसकी मौत का कारण बनता है।
किसी भी आर्तनाद को हमने देशद्रोही, पाकिस्तानी, खालिस्तानी, वामपंथी या कांग्रेसी साजिश कहकर हल्के में लिया जा रहा है। सामाजिक आर्थिक मसले जिनपर सर्वसहमति होनी चाहिए, विभाजन और ध्रुवीकरण का बहाना खोजा जा रहा है।

इस अभियान में जानबूझकर ऊंचा स्वर रखने वाला पढ़ा लिखा शहरी प्रोफेशनल तबका है। जिंदगी के जरूरी मसलों पर शून्य बेटे सन्नाटे की समझ रखने वाले तबके को यह जानकारी औऱ संवदेनशीलता पहुचनी चाहिए। इसलिए कि उनका तबका सबसे छोटा है। जब उनका नम्बर आएगा, तो उसे भी किसान, छात्र, मजदूर और जीवन के लिए संघर्षरत निचले तबके की मदद की आवश्यकता ज्यादा होगी।
यह लेख महक सिंह तरार साहब की फेसबुक वाल से जन सरोकार के लिए लिया गया है

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