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प्रोफेसर अख़लाक़ ‘आहन’

चम्बल घाटी के जंगल में एक पंचायत बुलाई गयी।

मामला एक मजबूर औरत के साथ ना-रवा सुलूक (अभद्र व्यवहार) और उस के बाद क़त्ल का था।
पंच नज़दीक के गांव के पांच बूढ़े थे।
कटहरे में मक़तूला की सड़ी लाश पड़ी थी। सामने गॉव के आम लोग बैठे हुए थे और आस-पास ऊँचे ऊँचे पत्थरों पर डाकू बंदूकें ताने बिराजमान थे। मुल्ज़िम (आरोपी) डाकुओं के गिरोह के थे। पंचों ने सारा मामला सुना, फिर आपस में कुछ खुसफुसाहट हुयी और सबसे बूढ़ा पंच मक़तूला की लाश को मुख़ातब कर के बोला:
“आप पर जो हमला हुआ, वो ग़लत था।”
“आप का बे-आबरू किया जाना क़ानूनन गुनाह था।”
“आप के क़त्ल का जुर्म साबित होता है।”
और हम मुत्तफ़ेक़ा तौर पर फैसला देते हैं कि आप को दूसरे गांव में दफन किया जाय और मुल्ज़िमों को बा-इज़्ज़त बरी किया जाय।
ऑर्डर ऑर्डर……!!!………………………

प्रोफेसर अख़लाक़ ‘आहन’
(जवाहर लाल नेहरू यूनिवर्सिटी)

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