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इमामुद्दीन अलीग

बिहार विधानसभा चुनाव में 5 सीटों पर AIMIM की अप्रत्याशित जीत के बाद देशभर में साम्प्रदायिक राजनीति और कम्युनलिज़्म पर बहस छिड़ गई। इस बहस की खास बात यह है साम्प्रदायिकता का कोई पैमाना तय किये बगैर सीधे फैसला सादिर किया जा रहा है। सभी AIMIM विरोधी असदुद्दीन ओवैसी और उनकी पार्टी को साम्प्रदायिक ठहरा रहे हैं तो वहीं, AIMIM समर्थक अपनी पार्टी का बचाव करते हुए अन्य पार्टियों पर कम्युनलिज़्म का आरोप लगा रहे हैं। ऐसे में सब से बेसिक सवाल तो यही उठता है कि आखिर किस आधार पर किसी पार्टी को कम्युनल माना जाएगा? आखिर साम्प्रदायिकता का पैमाना क्या है?

क्या किसी पार्टी का नेतृत्व मुसलमान के हाथ में होने से वह पार्टी कम्युनल हो जाती है? और वो पार्टी केवल मुसलमानों की पार्टी मानी जाएगी? या फिर किसी नेता के मुसलमान होने के कारण उसे केवल मुसलमानों का नेता माना जाएगा? अगर हां तो फिर इस बुनियाद पर देश की बाकी सभी अन्य पार्टियों को हिन्दू पार्टी मानना पड़ेगा और सभी हिन्दू नेताओं को मात्र हिंदुओं का लीडर मानना पड़ेगा। अगर मात्र किसी धर्म से जुड़े होने को साम्प्रदायिकता का आधार ठहराएंगे तो इस परिभाषा से देश की अधिकतर पार्टियों, नेताओं और उनके समर्थकों को दिक़्क़त होनी तय है। क्योंकि ऐसे में तो नास्तिकों को छोड़ हर नेता और हर पार्टी बल्कि, हर आस्तिक व्यक्ति कम्युनल माना जाएगा।

इस मामले में धर्म के आधार पर फैसला सुनाने से पहले साम्प्रदायिकता की परिभाषा तय करना बहुत ज़रूरी है। वरना, इस विषय के साथ न्याय नहीं किया जा सकता। आप खुद सोचिए कि क्या समाज में नमाज़, पूजा या नाम की वजह से किसी को कम्युनल माना जाता है? नहीं ना? समाज में लोग किसी को तब तक कम्युनल नहीं मानते जब तक कि जब तक वो साम्प्रदायिक बुनियाद पर किसी से नफरत और दुश्मनी न रखे या संप्रदायों के बीच नफरत और दुश्मनी न बढ़ाये। इस हिसाब से साम्प्रदायिकता की परिभाषा ” संप्रदायों के बीच नफरत और दुशमनी बढ़ाना या साम्प्रदायिक आधार पर नफरत और दुश्मनी रखना, किसी धर्म/समुदाय विशेष के खिलाफ कार्य या फैसले करना” ठहरती है।

इस परिभाषा के आधार पर देखा जाए तो असदुद्दीन ओवैसी समेत बेश्तर मुस्लिम नेताओं और मुस्लिम नेतृत्व वाली पार्टियों को साम्प्रदायिक ठहराया जाना गलत और आधारहीन बात है। क्योंकि, कुछ अपवाद को छोड़ कर इन पार्टियों और नेताओं पर कभी किसी धर्म या सम्प्रदाय के खिलाफ नफरत और दुश्मनी भड़काने का कोई आरोप साबित नहीं होता है। मुस्लिम नेतृत्व वाली सभी पार्टियां अच्छे से जानती हैं अगर उन्होंने कोई ऐसी-वैसी हरकत की तो सरकार चाहे जिसकी हो, कार्रवाई का चाबुक चलने, कटघरे में खड़ा होने और घिरने में देर नहीं लगेगी। यही वजह है कि साम्प्रदायिकता के विषय पर मुस्लिम नेता और मुस्लिम नेतृत्व वाली पार्टियां स्वयं ही ज़रूरत से ज़्यादा सतर्क रहती हैं। साथ ही यह पार्टियां न सिर्फ मुसलमानों की वकालत करती हैं, बल्कि दलितों, शोषितों और हाशिये पर खड़े अन्य सभी वर्गों के लिए भी आवाज़ उठाती रहती हैं ताकि वह भी मुख्य धारा की पार्टी बन सकें और मुसलमानों के अलावा अन्य समुदायों के बीच भी स्वीकार्य हो सकें। इसके बावजूद अगर नॉन मुलिम वोटर्स उन्हें वोट नहीं देते हैं और उन्हें अपना नेता और अपनी पार्टी मानने से कोसों दूर भागते हैं तो इसके लिए उन मुस्लिम नेताओं और मुस्लिम नेतृत्व वाली पार्टियों को ज़िम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता। बल्कि कमी कहीं और है जहां अक्सर लोग उंगली उठाने से बचते नज़र आते हैं।

सवाल यह है कि जब मुसलमान हिन्दू नेताओं को वोट दे सकते हैं और हिन्दू नेतृत्व वाली पार्टियों से जुड़ सकते हैं, तो हिन्दू जनता उस तरह किसी मुस्लिम नेता को वोट क्यों नहीं दे सकती? हिन्दू वोटर्स कभी किसी मुस्लिम नेतृत्व वाली पार्टी से क्यों नहीं जुड़ते? यहां हिन्दू कम्युनिटी की मानसिकता और साम्प्रदायिकता पर गंभीर सवाल उठता है लेकिन सेक्युलरिज़्म के झंडा-बरदार हिन्दू कम्युनिटी से सवाल करने के बजाए बड़े ही शातिराना तरीके से मुस्लिम नेताओं और सभी मुस्लिम नेतृत्व वाली पार्टियों को पेशगी तौर पर साम्प्रदायिक, कट्टर और विभाजनकारी ठहरा देते हैं! यह चीज़ भारत के सेक्युलर तबके के संबंध में शक पैदा करती है और बुनियादी तौर पर इसके दो ही कारण हो सकते हैं। या तो भारत का सेक्युलर तबका कम्युनलिज़्म और सेक्युलरिज़्म की बहस में जान-बूझ कर दांडी मरता है और मुसलमानों को लेकर अपने नज़रिए में ईमानदार नहीं है। या फिर उन्हें कम्युनलिज़्म और सेक्युलरिज़्म की परिभाषा ही नहीं पता है और इस टॉपिक पर वह बहस की शुरुआत ही देश के बहुसंख्यक हिंदुओं की मानसिकता के प्रभाव में आ कर जानिबदाराना फैसले से करते हैं।

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