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अनुराग गौतम

यह सर्वविदित है कि स्वतंत्रता आंदोलन में काँग्रेस का उल्लेखनीय योगदान रहा है। स्वतंत्रता आंदोलन में कांग्रेस के झंडे तले जवाहर लाल नेहरू, सरदार वल्लभ भाई पटेल,  मौलाना आजाद, गोविंद बल्लभ पंत आदि अनेक नेताओं का आंदोलन में महत्वपूर्ण योगदान दिया था। फलस्वरूप देश के आज़ाद होने के बाद अधिकांशता इन्ही नेताओं को केन्द्र व राज्यों की काँग्रेस सरकारों का मुखिया बनाया गया, आज़ादी के बाद 20 से 30 वर्ष तक काँग्रेस को कोई राजनैतिक चुनौती नही मिली। और अगर कुछ बामपंथी सरकारों और जनता दल के असफ़ल प्रयासों को छोड़ दे तो लगभग 40 वर्षों तक कांग्रेस ने केंद्र व राज्यों में एकछत्र राज किया। लेकिन फिर ऐसा क्या हुआ कि काँग्रेस 1990 के बाद लगातार कमज़ोर होती चली गई, और प्रयास करने बावजूद पुनः स्थापित नही हो पा रही है। आगे कुछ ऐसे ही मुद्दों की चर्चा की जा रही है जिन पर काँग्रेस को आत्ममंथन करने की आवश्यकता है।

स्वतंत्रता आंदोलन के समय मे काँग्रेस पार्टी में समाजवादी विचारधारा का प्रभाव था, जवाहर लाल नेहरू इसी विचारधारा के लिए जाने जाते थे। आज़ादी के बाद नेहरूवादी समाजवाद की स्थापना होती है जो लंबे समय तक चलता रहा था। किंतु इसके बाद काँग्रेस का झुकाव समाजवादी विचारधारा से दूर जाता रहा और एक स्वतंत्र समाजवादी राजनीति की शुरुआत 70 के दशक में होती है। कांग्रेस में वैचारिक परिवर्तन हो रहे थे जो 1990 के बाद स्पष्ट रूप से सामने आते है। काँग्रेस ने अपनी कोई विचारधारा स्पष्ट नही की कुछ मामलों में दक्षिणपंथ और कुछ मामलों में बामपंथ के बीच झूलती रही। काँग्रेस ने हर वैचारिक धरातल को छूने की कोशिश की। काँग्रेस का यह वैचारिक द्वंद राम मंदिर निर्माण, प्रोमोशन में आरक्षण तथा निजी क्षेत्र में आरक्षण जैसे मुद्दों पे काँग्रेस के ढुलमुल रवैये से स्पष्ठ होता रहा है। वर्तमान में काँग्रेस की कोई स्पष्ट विचारधारा नही है। काँग्रेस जब राजनीतिक रूप से मजबूत होती है तो ‘सेंटर टू राइट’ और जब कमज़ोर होती है तो ‘सेंटर टू लेफ़्ट’ व्यवहार करती है। राम मंदिर पर काँग्रेस का द्वंद इसी वैचारिक उठापटक को दर्शाता है, जबकि सोमनाथ मंदिर का निर्माण काँग्रेस के नेतृत्व में ही बिना किसी विवाद के संपन्न हुआ था। कांग्रेस की स्पष्ठ विचारधारा न होने के कारण सभी विचारधारा के मतदाता काँग्रेस को बहुत पसन्द नही करते है। वर्तमान में मतदाता काँग्रेस को सिर्फ एक राजनैतिक विकल्प के रूप में देखते है। यही वैचारिक द्वंद काँग्रेस के पतन के कारणों में शामिल है।

काँग्रेस के पतन का दूसरा कारण उसके पहले कारण से ही जुड़ा हुआ है। काँग्रेस का वैचारिक आधार स्पष्ठ न होने के कारण काँग्रेस के नेताओं व कार्यकर्ताओं की वैचारिक निष्ठा को हानि पहुचती रही व वैचारिक निष्ठावान नेताओं का मनोबल गिरता रहा, इसका लाभ अवशरवादी नेताओं ने उठाया। अब काँग्रेस में जो भी नेता आते थे वो व्यक्तिगत महत्वाकांक्षाओं से आते थे,जो अपने साथ कार्यकताओं व मतदाताओं को लेकर आते थे। इससे काँग्रेस विचारधारा आधारित पार्टी ने व्यक्ति आधारित पार्टी हो गई। इस प्रक्रिया ने काँग्रेस को संगठन को गहराई से प्रभावित किया। इसने काँग्रेस के अंदर क्षेत्रीय सूरमाओं को जन्म दिया जिसमें एक नेता का किसी एक क्षेत्र विशेष में प्रभाव होता है जैसे ग्वालियर चम्बल संभाग में ज्योतिरादित्य सिंधिया, महाकोशल क्षेत्र में कमलनाथ, भोपाल के आस पास के इलाक़ो में दिग्विजय सिंह, पश्चिमी राजस्थान में सचिन पायलट, हरियाणा में भूपेंद्र सिंह हुड्डा, आंध्र प्रदेश में राजशेखर रेड्डी, महाराष्ट्र में शरद पवार आदि। काँग्रेस की स्पष्ठ विचारधारा न होने के कारण इसके कैडराइज़ नेता व मतदाता नही है, इसलिए पार्टी क्षेत्रीय नेताओं पर आश्रित रहती है, इससे पार्टी को हालिया लाभ तो होता है किंतु दीर्घ कालिक हानि यह होती है कि जब कोई क्षेत्रीय नेता पार्टी छोड़ कर जाता है तो उस क्षेत्र के कार्यकर्ता बड़ी संख्या में कांग्रेस छोड़ उस नेता के साथ चले जाते है जिससे पार्टी उस क्षेत्र में अत्यन्त कमज़ोर हो जाती है और यह कांग्रेस का स्थायी नुकसान होता है।

कांग्रेस के पतन के अन्य कारण उसकी संरचना व सामाजिक अस्मिताओं से जुड़े है। काँग्रेस ने लंबे समय तक जिस वोट बैंक के सहारे राजनीति की उसमे मुख्य रूप से दलित, मुसलमान और सवर्ण हिन्दू शामिल थे। ये तीनों समुदाय मिलकर कुल वोटों का आधा वोट बना लेते है। किन्तु यह मतदाता समूह लंबे समय तक काँग्रेस के साथ रहने के बाद 1990 के बाद से काँग्रेस से दूर जाता रहा। इस मतदाता समूह के सवर्ण वोटरों का समय के साथ भाजपा की तरफ़ स्थानांतरण हो गया। मुसलमान मतदाताओं को जहां विकल्प मिला उन्होंने क्षेत्रीय दलों की ओर मुंह फेर लिया जैसे उत्तर प्रदेश, बिहार, तेलंगाना व पश्चिम बंगाल आदि व दलित मतदाताओं ने उत्तर भारत मे अपनी पार्टी बहुजन समाज पार्टी खड़ी कर ली और अधिकांश राज्यों में कांग्रेस के निष्ठावान मतदाता बने रहे है। दलित लंम्बे समय से काग्रेस के निष्ठावान मतदाता रहे है किंतु काँग्रेस ने सत्ता के शीर्ष पदों जैसे मुख्यमंत्री, प्रधानमंत्री आदि पदों से दलित नेताओं को हमेशा दूर ही रखा है। काँग्रेस के कुल मतदाता समूह में दलितों की भागीदारी एक तिहाई थी लेकिन सत्ता के शीर्ष पदों पर दलितों की हिस्सेदारी शून्य रही। बाबू जगजीवन राम के प्रधानमंत्री बनने के दो अवशर 1977 व 1979 में आये, किंतु किन्ही कारणों से उन्हें प्रधानमंत्री नही बनने दिया गया। काँग्रेस से मिले इन धोखों से दलित बुद्धिजीवीयों व दलित मतदाताओं के मन मे काँग्रेस के प्रति आशंका बढ़ती रही।

जिससे दलित मतदाता काँग्रेस से दूर होते गये, जिसका नतीजा बामसेफ़ और बहुजन समाज पार्टी की स्थापना के रूप में आया। काँग्रेस ने दलित व अल्पसंख्यक समुदाय के वोटों के सहारे लंबे समय तक राज किया किन्तु सत्ता के शीर्ष पदों से हमेशा दूर रखा। इस तरह काँग्रेस ने अपना एक निष्ठावान मतदाता समूह खो दिया। मुसलमान मतदाता समूह ने भी कुछ ऐसा किया, मुसलमान मतदाता समूह को काँग्रेस के विकल्प के रूप में कोई क्षेत्रीय राजनीतिक दल मिले तो वे उसी तरफ़ झुक गये। जिसके उदाहरण के रूप में समाजवादी पार्टी, राष्ट्रीय जनता दल, बहुजन समाज पार्टी, तेलंगाना राष्ट्र समिति आदि अनेक दल है इस प्रकार काँग्रेस का मुस्लिम मतदाता समूह भी उससे दूर छिटक गया। ये भी काँग्रेस के पतन के कारणों में सुमार है।

पिछड़ा वर्ग आंदोलन ने भारत की राजनीति को गहराई से प्रभावित किया है इससे काँग्रेस की राजनीति का भी प्रभावित होना लाज़िमी है। 1990 के दौर में जब मंडल कमीशन की रिपोर्ट लागू हुई और इसपर कानूनी लड़ाई हुई तब काँग्रेस ने मंडल कमीशन के पक्ष या विपक्ष में अपनों राय स्पष्ठ नही बल्कि मंडल कमीशन का विरोध ही किया है। मंडल रिपोर्ट लागू होने के बाद पिछड़े वर्ग के लोगों की राजनीति में भागीदारी बढ़ने लगी, सभी पार्टियों ने अपने पिछड़े वर्ग के नेताओ को आगे किया, इस प्रकार काँग्रेस पार्टी के संगठन में लोकतंत्रीकरण की प्रक्रिया आरम्भ हुई और आजादी के बाद सीताराम केसरी काँग्रेस के पहले पिछड़े वर्ग से अध्यक्ष नियुक्त किये गये, काँग्रेस के लोकतंत्रीकरण की प्रक्रिया शुरू ही हुई थी कि काँग्रेस के अंदर सोनिया गांधी के उभार ने इस प्रक्रिया को हमेशा के लिए ख़त्म कर दिया और 1998 में सोनिया गाँधी अध्यक्ष पद पर आसीन हुई। जबकि सीताराम केसरी पार्टी संगठन में चुनाव के बाद अध्यक्ष बने थे।

उसके बाद आज तक पिछड़ा वर्ग का कोई नेता काँग्रेस का अध्यक्ष नही बना है। आज कांग्रेस का मतदाता वर्ग मुख्यतया मूसलमान, दलित, और पिछड़ा वर्ग है किंतु काँग्रेस के शीर्ष पदों पर सवर्ण नेताओं का कब्ज़ा बरकरार है, काँग्रेस ने क्षेत्रीय नेतृत्व के लोकतंत्रीकरण की पहल जरूर की है जिसके तहत ही अशोक गहलोत, भूपेश बघेल, सचिन पायलट आदि पिछड़े वर्ग के नेता उभरे है जिसका लाभ काँग्रेस को विधानसभा के चुनावों में मिला भी है, किंतु अभी केंद्रीय स्तर पर यह कार्य होना बाक़ी है। काँग्रेस पार्टी को राजनीति में पुनः स्थापित होने के लिए उपरोक्त मुद्दों पर आत्म मँथन करना चाहिये।

लेखक: अनुराग गौतम शोधार्थी दिल्ली विश्वविद्यालय

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