सोनाझरिया मिंज बनेगी देश की पहली आदिवासी महिला कुलपति

शुभांशु सिंह

सोनाझरिया मिंज जे.एन.यु (JNU)  शिक्षक संघ की भी शायद पहली आदिवासी अध्यक्ष रही हैं, अब वो भारत के किसी भी विश्वविद्यालय की संभवतः पहली आदिवासी महिला रूप में कमान सँभालने जा रही हैं. अकादमिक कौंसिल की मीटिंग में शिक्षकों और छात्रों की हक़ की बात उठाने वाले व्यक्ति को अब उनके लिए योजना बनाने और लागू करने का मौका भी मिलेगा.

शांत स्वभाव, हँस-मुख और शालीन व्यक्तित्व, लेकिन साथ ही साथ राजनैतिक नेतृत्व की परिपक़्वता. यह सोनाझरिया मिंज जैसे व्यक्तित्व से पहली मुलाक़ात में आप पर पड़ी छाप है जे.एन.यु (JNU) छात्र संघ का पदाधिकारी होने के नाते उस वक़्त की शिक्षक संघ (Teachers Association) के अध्यक्ष से मेरी मुलाक़ात उन्ही के ऑफिस में हुयी थी, जिसकी अलमारियों के साथ-साथ मेज़ भी किताबों से अटी पड़ी थी. जे.एन.यु (JNU) में अधिकतर आंदोलनों की लड़ाईयां शिक्षक और छात्र साथ मिलकर ही लड़ते हैं. शिक्षक संघ में मिंज मैडम की सक्रियता किसी के छुपी नहीं है – चाहे वह अनिवार्य उपस्तिथि के खिलाफ हुआ आंदोलन हो या सीट-कट कर आरक्षण को निष्क्रिय करने के ख़िलाफ़ की गयी लड़ाई हो – इन आंदोलनों में मिंज मैडम के नेतृत्व से जे.एन.यु (JNU) का प्रत्येक भागीदार परिचित है. यही अवसर अब झारखण्ड के सिदो-कान्हू मुर्मू विश्वविधालय के छात्रों, शिक्षकों और कर्मचारियों को मिलने वाला है, जहाँ पर राज्य सरकार ने उनको कुलपति नियुक्त किया है. वो कई सालों से जे.एन.यु (JNU) में कंप्यूटर साइंस के विभाग में प्रोफेसर के रूप में कार्यरत हैं.

 सोनाझरिया मिंज झारखण्ड के गुमला जिले से ताल्लुक़ रखती हैं और ओराओं जनजाति से आती हैं. किसी भी आदिवासी महिला के लिए शिक्षित होना संघर्ष से कम नहीं है, और उच्च शिक्षा प्राप्त पर शिक्षा की व्यवस्था का नेतृत्व संभालना किसी भी बड़ी कामयाबी से कम नहीं आँका जा सकता. मिंज जल्द ही झारखण्ड जैसे ऐतिहासिक राज्य जिसका नाम और अस्तित्व ही आदिवासियों के अस्मिता से जुड़ा हुआ है, उसमें शिक्षा के स्तर को निश्चित ही नयी उँचाईयों पर ले जाने का काम करेगीं. सामाजिक न्याय पसंद लोगों के लिए यह गर्व करने का छण है कि जल्द ही आदिवासी भी शिक्षा की व्यवस्था का नेतृत्व कर पाएंगे जिसके कि मुख्यधारा में वो अपने ज्ञान प्रणाली और सांस्कृतिक धरोहर को पहचान दिला पाएं.

इस कदम से वास्तव में सिदो-कान्हू मुर्मू जैसे योद्धा के ऐतिहासिक संथाल परगना के आज़ादी के संघर्ष को भी आधुनिक शिक्षा और इतिहास के जगत में उचित और न्यायसंगत स्थान मिलेगा.

लेखक जवाहरलाल नेहरु यूनिवर्सिटी दिल्ली के राजनैतिक शास्त्र डिपार्टमेंट में  पीएचडी शोधार्थी हैं

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