पिछले छह साल में कई बार यह देखने को मिला है कि जब-जब मोदी सरकार मुसीबत में फंसती है, कानून के नाम पर उसे बचाने के लिए सुप्रीम कोर्ट आगे आता है. चाहे राफेल सौदा हो या फिर बाबरी मस्जिद का मामला. हर जटिल मौके पर अदालत ने सरकार को मदद पहुंचाई है. अब जब कृषि कानूनों के खिलाफ चल रहे किसान आंदोलन से मोदी सरकार के पसीने छूटने लगे थे, एक बार फिर सुप्रीम कोर्ट सरकार की मदद में आगे आया है.

सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को इस मामले की सुनवाई करते हुए कृषि कानूनों पर रोक लगा दी. कोर्ट के अगले आदेश तक ये कानून लागू नहीं होंगे. अदालत ने इन कानूनों पर चर्चा के लिए एक समिति का गठन भी किया है. जिसके लिए कोर्ट ने हरसिमरत मान, कृषि अर्थशास्त्री अशोक गुलाटी, डॉ प्रमोद कुमार जोशी (पूर्व निदेशक राष्ट्रीय कृषि अनुसंधान प्रबंधन), अनिल धनवत के नाम कमिटी के सदस्य के तौर पर सुझाए हैं.

सुप्रीम कोर्ट कमेटी बनाने के लिए इतना बेताब था कि जब किसानों का पक्ष रख रहे वकील शर्मा ने सुनवाई के दौरान कहा कि किसान संगठन सुप्रीम कोर्ट की ओर से समिति गठित किए जाने के पक्ष में नहीं हैं तो इस पर कोर्ट ने कहा कि वो इसके लिए अंतरिम आदेश देगी.

बता दें कि सोमवार को मामले की सुनवाई करते हुए चीफ जस्टिस बोब़डे ने एक कमेटी के गठन की बात कही थी. उसी वक्त किसान संगठनों ने साफ कह दिया था कि उन्हें किसी तरह की कमेटी मंजूर नहीं है. वो नहीं चाहते हैं कि उनका मामला किसी कमेटी के सामने पेश किया जाये. उनकी सिर्फ एक ही मांग है कि इन कानूनों को पूरी तरह रद्द कर दिया जाये.

किसानों के साफ-साफ मना करने के बावजूद सुप्रीम कोर्ट .ने जिस तरह से कमेटी का गठन कर मामले को कमेटी के हवाले सौंप दिया है, उससे साफ पता चलता है कि यह सब कुछ एक कहानी का हिस्सा है. कमेटी गठन करने का प्रस्ताव तो मोदी सरकार ने भी दिया था. उस वक्त भी किसान नेताओं ने उस प्रस्ताव को सिरे से खारिज कर दिया था. अब सुप्रीम कोर्ट ने अपनी सुप्रीम पावर दिखाते हुए एक कमेटी का गठन कर मोदी सरकार को राहत पहुंचाने की कोशिश की है.

सुप्रीम कोर्ट ने कृषि कानूनों पर अगले आदेश तक रोक लगा दी है. यह भी सरकार को मदद पहुंचाने के लिए ही किया गया है. सरकार को लगता है कि कोर्ट के सहारे कानून को कुछ दिन तक रोकने पर आंदोलन खत्म हो जायेगा, उसके बाद किसानों को कमेटी में उलझा कर उन्हें उनके मकसद से भटका दिया जायेगा.

किसान इस पूरे खेल को समझ रहे हैं, इसलिए वो पहले दिन से ही कमेटी बनाये जाने का विरोध कर रहे हैं. किसान नेता तो इस मामले के लिए अदालत के सामने भी जाना नहीं चाहते थे, लेकिन जनहित याचिका के नाम पर सुप्रीम कोर्ट ने मामले की सुनवाई कर किसान आंदोलन को खत्म करने का अच्छा प्रयास किया है.

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